रसूलाबाद। कहते हैं कि अगर हौसलों में उड़ान हो, तो तंगहाली और मुश्किलें भी घुटने टेक देती हैं। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है रसूलाबाद क्षेत्र के थानापूर्वा गांव के रहने वाले देवचंद्र राजपूत ने। तमाम अभावों और दुखों के पहाड़ों को पार करते हुए देवचंद्र का चयन भारतीय सेना (आर्मी) में हुआ है। जब वह ट्रेनिंग के लिए रवाना हुए, तो पूरे गांव ने पलक-पावड़े बिछाकर उन्हें ऐसी भव्य विदाई दी, जिसे देख हर आंख नम हो गई और हर सीना गर्व से चौड़ा हो गया।
देवचंद्र का यह सफर आसान नहीं था। नियति ने बचपन से ही उनकी कड़ी परीक्षा ली। 13 साल पहले सिर से पिता तेजसिंह का साया उठ गया।
5 साल पहले मां राखी देवी भी इस दुनिया को छोड़ गईं।
अनाथ हो चुके देवचंद्र और उनके भाई-बहनों के सिर पर संकट मंडराया, तो उनके बाबा कुँवर बहादुर ढाल बनकर खड़े हो गए। बाबा ने पाई-पाई जोड़कर देवचंद्र को पाला-पोसा और इस काबिल बनाया। देवचंद्र अपनी इस ऐतिहासिक सफलता का पूरा श्रेय अपने बाबा को देते हैं, जिन्होंने माता-पिता दोनों का फर्ज निभाया।
एक बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले देवचंद्र की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। 3 बहनों (जिसमें से एक की शादी हो चुकी है) और दो भाइयों के बड़े परिवार में पढ़ाई का खर्च उठाना नामुमकिन सा था। लेकिन देवचंद्र ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी पढ़ाई और तैयारी का खर्च निकालने के लिए इधर-उधर मजदूरी तक की। दिन में हाड़-तोड़ मेहनत और रात को किताबों के साथ संघर्ष—यही देवचंद्र की दिनचर्या बन गई थी। आखिरकार, उनके कड़े परिश्रम ने रंग दिखाया और देश सेवा का टिकट हासिल कर लिया।
ट्रेनिंग पर रवाना होने से पहले देवचंद्र ने अपनी जड़ों को नहीं भूला। उन्होंने सबसे पहले अपने गांव के स्थानीय मंदिर में जाकर माथा टेका। इसके बाद वह रसूलाबाद के प्रसिद्ध श्री धर्मगढ़ बाबा मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने भगवान का आशीर्वाद लिया और देश की रक्षा का संकल्प लिया।
जैसे ही देवचंद्र की रवानगी का समय आया, पूरा थानापूर्वा गांव सड़कों पर उतर आया। भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारों से पूरा इलाका गूंज उठा। ग्रामीणों ने फूल-मालाओं और गाजे-बाजे के साथ अपने इस लाल को विदा किया। ग्रामीणों का कहना है कि देवचंद्र ने न सिर्फ अपने परिवार का, बल्कि पूरे क्षेत्र का नाम रोशन किया है और वह युवाओं के लिए एक मिसाल बन गए हैं।
”मुश्किलें कितनी भी बड़ी हों, अगर इरादे फौलादी हों तो सेना की वर्दी दूर नहीं।” देवचंद्र की यह कहानी आज हर उस युवा को प्रेरित कर रही है जो विपरीत हालातों से लड़कर कुछ बड़ा करना चाहता है।













