क्या न्याय के घर में ही हो रहा है सौतेला व्यवहार
कानपुर देहात। सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2011 से पूर्व बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत शिक्षकों पर शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) अनिवार्य किए जाने के फैसले ने देश में एक नई कानूनी और सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है। देश के समस्त शिक्षक समूहों और संगठनों ने इस आदेश को पूरी तरह से
अव्यावहारिक करार दिया है। इसके साथ ही शिक्षकों ने न्यायपालिका की स्वयं की नियुक्ति प्रक्रिया यानी कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल उठाते हुए इसे दोहरा मापदंड और सौतेला व्यवहार बताया है। इस पूरे विवाद के पीछे शिक्षकों के तर्क हैं कि उनकी नियुक्ति के समय जो वैधानिक नियम थे उसके तहत उनकी नियुक्ति हुई थी। शिक्षक उस समय के तत्कालीन नियमों और अनिवार्य योग्यताओं को पूरी तरह पूरा किए थे, जिसके आधार पर उनका चयन निष्पक्ष रूप से हुआ था। 20 से अधिक वर्षों तक देश के भविष्य को संवारने और अपनी सेवाएं देने के बाद अचानक वर्तमान नौकरी में बने रहने के लिए टेट जैसी प्रतियोगी परीक्षा पास करने का आदेश देना पूरी तरह से तर्कहीन है।
अन्य विभागों पर लागू क्यों नहीं- शिक्षकों का सवाल है कि यदि नियमों को भूतलक्षी प्रभाव (Retrospective Effect) से लागू करना है तो यह नियम देश के सभी सरकारी विभागों और प्रशासनिक सेवाओं पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए। शिक्षकों ने अपनी योग्यता साबित करने के आदेश की तुलना सीधे सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति प्रक्रिया से कर दी है। शिक्षकों का कहना है कि अगर एक शिक्षक को 20 साल नौकरी करने के बाद भी अपनी नौकरी बचाने के लिए पात्रता परीक्षा देनी पड़ सकती है तो देश के सबसे बड़े न्यायिक पदों (न्यायाधीश और मुख्य न्यायाधीश) पर बैठने वालों के लिए कोई प्रतियोगी परीक्षा क्यों नहीं होती? वर्तमान में न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति कॉलेजियम व्यवस्था के तहत होती है जिस पर लंबे समय से विवाद चल रहा है। शिक्षकों का कहना है कि जजों की नियुक्ति बंद कमरों में होती है जिससे जनता को इसकी चयन प्रक्रिया का पता नहीं चलता।भाई-भतीजावाद (अंकल जज सिंड्रोम)- इस व्यवस्था पर अक्सर आरोप लगते हैं कि यह जजों के परिचितों या बच्चों को ही जज बनाने की प्रथा को बढ़ावा देती है। आलोचकों और सरकार का मानना है कि लोकतंत्र में इतनी बड़ी नियुक्ति प्रक्रिया का जनता और विधायिका के प्रति जवाबदेह होना अनिवार्य है जो कॉलेजियम में नहीं दिखता। यह बहस इसलिए भी गंभीर हो जाती है क्योंकि जब भी कॉलेजियम व्यवस्था को बदलने या उसमें पारदर्शिता लाने का प्रयास किया गया तब खुद ही न्यायपालिका ने उसे स्वीकार नहीं किया। वर्ष 2014 में केंद्र सरकार ने जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता लाने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम पारित किया था। इसका उद्देश्य जजों की नियुक्ति में न्यायपालिका और सरकार (कार्यपालिका) दोनों की बराबर भागीदारी सुनिश्चित करना था लेकिन 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता के खिलाफ मानते हुए असंवैधानिक घोषित करके रद्द कर दिया और पुरानी कॉलेजियम व्यवस्था को दोबारा लागू कर लिया।
नियुक्ति का आधार-
शिक्षकों और न्यायाधीशों की नियुक्ति के आधार में जमीन-आसमान का अंतर है। जहां एक तरफ बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षकों का चयन कठिन योग्यता परीक्षा, कड़े प्रशिक्षण और वर्तमान में अनिवार्य की गई शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) के माध्यम से होता है वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली अपनाई जाती है जिसमें वरिष्ठ न्यायाधीशों की आपसी सिफारिश के आधार पर ही पद दिए जाते हैं।
चयन में पारदर्शिता-
दोनों विभागों की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता के स्तर को लेकर बड़ा विवाद है। शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह सार्वजनिक होती है जिसमें खुली प्रतियोगी परीक्षाएं, मेरिट लिस्ट और कड़ा दस्तावेज सत्यापन शामिल होता है। इसके विपरीत न्यायाधीशों के चयन की प्रक्रिया बंद कमरों में चर्चा के जरिए होती है जिसे लोग अत्यंत अपारदर्शी मानते हैं क्योंकि इसमें चयन के ठोस कारणों को सार्वजनिक नहीं किया जाता है।
बदलाव के प्रति रुख-
नियमों में बदलाव और सुधारों को स्वीकार करने के मामले में दोनों के प्रति दोहरा रवैया दिखता है। दशकों से सेवा दे रहे शिक्षकों पर 20 साल बाद भी नए नियम और टेट जैसी परीक्षाएं जबरन थोप दी जाती हैं जिसे उन्हें मानना ही पड़ता है। वहीं न्यायपालिका ने अपनी व्यवस्था में सुधार के लिए सरकार द्वारा लाए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) जैसे प्रयासों को असंवैधानिक घोषित कर सिरे से खारिज कर दिया जोकि सरासर गलत है। इस पूरे मामले की संवेदनशीलता को देखें तो शिक्षकों का गुस्सा स्वाभाविक प्रतीत होता है। एक तरफ जहां न्यायपालिका देश के रीढ़ यानी शिक्षकों को दशकों की सेवा के बाद भी नई पात्रता परीक्षा से गुजरने का आदेश देती है वहीं दूसरी तरफ खुद की नियुक्ति के लिए किसी भी प्रकार की खुली प्रतियोगी परीक्षा या बाहरी हस्तक्षेप को न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर खतरा बताकर खारिज कर देती है। लोकतंत्र में कानून सबके लिए समान होना चाहिए। यदि बदलते समय के साथ शिक्षकों की योग्यता की समीक्षा जरूरी है तो न्यायपालिका की नियुक्ति प्रक्रिया में भी पारदर्शिता और खुली प्रतियोगिता की मांग उठना पूरी तरह से न्यायसंगत और तार्किक है।








