क्या टीईटी परीक्षा पास कर लेना ही उत्कृष्ट शिक्षण की गारंटी देता है
कानपुर देहात। टीईटी को लेकर होने वाली अधिकांश बहसों में एक बात लगभग निर्विवाद सत्य की तरह प्रस्तुत की जाती है कि यह परीक्षा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसा प्रतीत कराया जाता है मानो टीईटी के आने से पहले शिक्षा व्यवस्था एक अंधकार युग में थी और उसके बाद गुणवत्ता का नया युग शुरू हो गया लेकिन किसी भी शैक्षिक नीति का मूल्यांकन भावनाओं, धारणाओं और घोषणाओं से नहीं बल्कि प्रमाणों और परिणामों से होना चाहिए। इसलिए आज एक असुविधाजनक लेकिन आवश्यक प्रश्न पूछा जाना चाहिए। क्या पिछले डेढ़ दशक में ऐसा कोई व्यापक और निर्णायक अध्ययन उपलब्ध है जो यह सिद्ध करता हो कि केवल टीईटी लागू होने के कारण शिक्षण गुणवत्ता में नाटकीय सुधार हुआ है? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2011 के बाद देश में लाखों शिक्षक टीईटी के माध्यम से नियुक्त हुए। यदि टीईटी वास्तव में शिक्षक गुणवत्ता की निर्णायक कसौटी है तो उसका प्रभाव सीखने के परिणामों, कक्षा शिक्षण, बच्चों की समझ, भाषा दक्षता, गणितीय क्षमता और विद्यालयी उपलब्धियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए था लेकिन पिछले वर्षों में जारी विभिन्न राष्ट्रीय और स्वतंत्र आकलन रिपोर्टों को देखने पर तस्वीर इतनी सरल नहीं दिखाई देती। अनेक राज्यों में टीईटी योग्य शिक्षकों की नियुक्तियों के बावजूद सीखने के स्तरों को लेकर चिंता लगातार बनी हुई है। इसका अर्थ यह नहीं कि टीईटी असफल है बल्कि इसका अर्थ यह है कि गुणवत्ता का प्रश्न टीईटी से कहीं अधिक जटिल है। दरअसल यहाँ सबसे बड़ी समस्या टीईटी के अस्तित्व से नहीं बल्कि उसके बारे में किए जाने वाले दावों से है। टीईटी को एक न्यूनतम पात्रता परीक्षा के रूप में स्वीकार करना एक बात है लेकिन उसे शिक्षक गुणवत्ता का अंतिम और निर्णायक प्रमाणपत्र घोषित कर देना बिल्कुल अलग बात है। कोई भी लिखित परीक्षा अधिकतम यह बता सकती है कि परीक्षार्थी को कुछ विषयगत और शिक्षाशास्त्रीय अवधारणाओं का ज्ञान है लेकिन क्या वह यह बता सकती है कि वह एक डरे हुए बच्चे में आत्मविश्वास कैसे जगाएगा? क्या वह यह बता सकती है कि पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी को सीखने के लिए कैसे प्रेरित करेगा? क्या वह यह माप सकती है कि वह विविध सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमियों से आए बच्चों के साथ कितना प्रभावी संवाद स्थापित कर सकता है? क्या वह यह जान सकती है कि किसी शिक्षक में धैर्य, संवेदनशीलता, नेतृत्व और मानवीय समझ कितनी है? शिक्षाशास्त्र का इतिहास बताता है कि अच्छा शिक्षक बनने और परीक्षा पास करने के बीच संबंध अवश्य है लेकिन वह सीधा और पूर्ण संबंध नहीं है। यदि केवल परीक्षा पास कर लेना ही उत्कृष्ट शिक्षण की गारंटी होता तो दुनिया के सबसे सफल शिक्षक वही होते जिनके परीक्षा अंक सबसे अधिक होते। वास्तविकता यह है कि शिक्षण एक जीवंत मानवीय प्रक्रिया है जिसे केवल वस्तुनिष्ठ प्रश्नों और उत्तरों में नहीं समेटा जा सकता।
यहीं एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। यदि टीईटी शिक्षा की गुणवत्ता का इतना ही निर्णायक उपकरण है तो फिर पिछले पंद्रह वर्षों में शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों, सेवाकालीन प्रशिक्षणों, कार्यशालाओं, नवाचार कार्यक्रमों और सतत व्यावसायिक विकास योजनाओं की भूमिका क्या रह जाती है? यदि अंततः गुणवत्ता का अंतिम प्रमाण एक पात्रता परीक्षा ही है तो क्या यह उन सभी प्रशिक्षण व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न नहीं लगाता जिन्हें सरकारें और संस्थाएँ वर्षों से चला रही हैं? विडंबना यह है कि शिक्षा व्यवस्था स्वयं एक विरोधाभास में फँसी दिखाई देती है। एक ओर शिक्षकों को लगातार प्रशिक्षित किया जाता है, नई शिक्षण विधियाँ सिखाई जाती हैं, नई नीतियों से परिचित कराया जाता है और पेशेवर विकास पर जोर दिया जाता है। दूसरी ओर गुणवत्ता की चर्चा आते ही पूरा विमर्श फिर एक पात्रता परीक्षा के इर्द-गिर्द सिमट जाता है। मानो वर्षों का अनुभव, प्रशिक्षण, कक्षा प्रदर्शन और विद्यार्थियों के साथ काम करने का वास्तविक इतिहास सब कुछ गौण हो और अंतिम सत्य केवल एक परीक्षा हो। इसका अर्थ यह नहीं कि टीईटी निरर्थक है। किसी भी पेशे में न्यूनतम मानक आवश्यक होते हैं लेकिन न्यूनतम मानक और अंतिम गुणवत्ता प्रमाणपत्र में अंतर होता है। समस्या तब पैदा होती है जब न्यूनतम पात्रता को गुणवत्ता का पर्याय बना दिया जाता है। तब बहस शिक्षण से हटकर प्रमाणपत्र पर केंद्रित हो जाती है, सीखने से हटकर कटऑफ पर और कक्षा से हटकर परीक्षा कक्ष पर। शिक्षा की गुणवत्ता का वास्तविक प्रश्न कहीं अधिक व्यापक है। उसमें शिक्षक की तैयारी है लेकिन उसके साथ विद्यालयी वातावरण भी है। उसमें विषय ज्ञान है लेकिन उसके साथ बच्चों की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ भी हैं। उसमें शिक्षक की भूमिका है लेकिन उसके साथ प्रशासनिक समर्थन, संसाधन, प्रशिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता और अभिभावकीय सहभागिता भी है। इतने जटिल प्रश्न का उत्तर किसी एक परीक्षा में खोजने का प्रयास स्वयं शिक्षा की जटिलता को कम करके आंकना है इसलिए आज आवश्यकता टीईटी के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं बल्कि उसके वास्तविक स्थान को समझने की है। टीईटी एक उपयोगी पात्रता परीक्षा हो सकती है लेकिन उसे शिक्षा की गुणवत्ता का एकमात्र प्रहरी घोषित करना न तो शिक्षाशास्त्रीय रूप से उचित है और न ही तार्किक रूप से सिद्ध। जब तक यह प्रमाणित न हो जाए कि टीईटी ने अकेले ही शिक्षण गुणवत्ता में निर्णायक परिवर्तन किया है तब तक उसके बारे में किए जाने वाले दावों को भी संयमित और प्रमाण-आधारित होना चाहिए। आखिर शिक्षा का संसार इतना सरल नहीं है कि उसे एक प्रश्नपत्र और एक कटऑफ में समेट दिया जाए। यदि ऐसा होता तो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक परीक्षा केंद्रों में मिलते, कक्षाओं में नहीं और शायद यही वह प्रश्न है जिसे टीईटी की हर बहस के केंद्र में रखा जाना चाहिए।













