शिक्षकों को न समझे राजनीति का अखाड़ा

कानपुर देहात। एक शिक्षक आखिर होता क्या है? क्या वह केवल पाठ्यपुस्तक पढ़ने वाला कर्मचारी है? क्या उसका काम केवल परीक्षा परिणाम तैयार करना है? यदि ऐसा होता तो मशीनें यह काम बेहतर कर लेतीं। शिक्षक की वास्तविक शक्ति उसकी बौद्धिक स्वतंत्रता, उसके जीवनानुभव, उसकी सामाजिक समझ और उसके भीतर मौजूद नैतिक बेचैनी में होती है। वही बेचैनी उसे बच्चों के भीतर प्रश्न पैदा करना सिखाती है। वही उसे अन्याय देखकर असहज बनाती है। वही उसे संवेदनशील बनाती है। आज का समाज शायद अपने सबसे असुरक्षित दौर में है। असहमति अब विचार नहीं मानी जाती, पहचान मान ली जाती है। कोई क्या पढ़ता है, क्या लिखता है, किससे सहमत है, किससे असहमत है इन सबके आधार पर तुरंत उसे किसी खेमे, किसी विचारधारा, किसी राजनीतिक कतार में खड़ा कर दिया जाता है। इस माहौल का सबसे खतरनाक असर तब दिखाई देता है जब शिक्षक जैसे बौद्धिक और संवेदनशील व्यक्ति से भी यह अपेक्षा की जाने लगे कि वह तटस्थ दिखने के नाम पर अपनी चेतना को ही छिपा ले। समस्या यह नहीं है कि शिक्षक की कोई विचारधारा है। समस्या तब पैदा होती है जब समाज शिक्षक को विचार रखने का अधिकार तो देना चाहता है लेकिन केवल वही विचार जो उसके अनुकूल हों। यानी शिक्षक से अपेक्षा यह नहीं कि वह निष्पक्ष हो, बल्कि यह कि वह अनुकूल हो। यह स्थिति शिक्षा के लिए अत्यंत खतरनाक है क्योंकि जिस दिन शिक्षक अपने विचारों को छिपाकर केवल सुरक्षित वाक्य बोलने लगेगा उसी दिन शिक्षा संवाद नहीं औपचारिकता बन जाएगी। आज समाज विचारधारा शब्द से इतना भयभीत हो गया है कि उसे लगता है कि विचार रखने वाला हर व्यक्ति खतरनाक है जबकि सच यह है कि विचारशून्य समाज सबसे अधिक खतरनाक होता है। विचारधारा स्वयं में समस्या नहीं है समस्या कट्टरता है। समस्या वह क्षण है जब कोई शिक्षक अपने विचारों को अंतिम सत्य मानकर छात्रों पर थोपने लगे लेकिन उतनी ही बड़ी समस्या यह भी है कि शिक्षक को इस डर में जीना पड़े कि यदि उसने किसी सामाजिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक मुद्दे पर अपनी मानवीय प्रतिक्रिया व्यक्त की तो उसकी पेशेवर निष्ठा पर सवाल उठ जाएगा। एक शिक्षक की निजी सोच को उसके शिक्षण से अलग करके समझने की बौद्धिक क्षमता समाज में होनी चाहिए। यदि कोई शिक्षक अपने छात्रों को प्रश्न पूछना सिखा रहा है, विभिन्न दृष्टिकोणों को समझना सिखा रहा है, सत्य और तर्क के आधार पर सोचने की आदत विकसित कर रहा है तो उसकी निजी वैचारिक स्थिति से डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए बल्कि ऐसे शिक्षक लोकतंत्र की बुनियाद मजबूत करते हैं।
विडंबना यह है कि आज वही समाज जो बच्चों से क्रिटिकल थिंकिंग की अपेक्षा करता है, वह शिक्षकों से सुरक्षित चुप्पी चाहता है। वह चाहता है कि शिक्षक केवल उतना ही बोले जितना किसी को असुविधाजनक न लगे लेकिन इतिहास गवाह है कि शिक्षा हमेशा उन लोगों ने आगे बढ़ाई जिन्होंने प्रश्न पूछने का साहस रखा। यदि शिक्षक के भीतर से प्रश्न खत्म कर दिए जाएंगे तो छात्रों के भीतर भी जिज्ञासा धीरे-धीरे मर जाएगी। यह भी समझना होगा कि शिक्षक समाज की राजनीतिक लड़ाइयों का सैनिक नहीं है। उसका काम किसी दल, समूह या सत्ता के लिए विचार तैयार करना नहीं बल्कि छात्रों को इतना सक्षम बनाना है कि वे स्वयं सोच सकें। शिक्षक यदि सचमुच अपने दायित्व का निर्वाह कर रहा है तो वह छात्रों को किसी एक विचारधारा का अनुयायी नहीं बल्कि विवेकशील नागरिक बनाएगा। सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब व्यवस्था को सोचने वाला शिक्षक असुविधाजनक लगने लगता है क्योंकि सोचने वाला शिक्षक केवल पढ़ाएगा नहीं, सवाल भी पूछेगा। वह बच्चों को भी सवाल पूछना सिखाएगा और हर सत्ता, हर कट्टर समूह और हर वैचारिक अंधता को सबसे ज्यादा डर प्रश्नों से ही लगता है इसलिए आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि शिक्षक को विचारशून्य बनाया जाए बल्कि इस बात की है कि उसे इतना नैतिक और विवेकशील बनाया जाए कि वह अपनी निजी सोच के बावजूद छात्रों की स्वतंत्र सोच का सम्मान कर सके। शिक्षा का उद्देश्य एक जैसे दिमाग तैयार करना नहीं बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना है जो असहमति के बीच भी संवाद कर सकें।
यदि समाज सचमुच शिक्षा को बचाना चाहता है तो उसे शिक्षक को संदेह की नजर से देखना बंद करना होगा क्योंकि जिस दिन शिक्षक केवल डर के कारण बोलना बंद कर देगा उस दिन कक्षा में पाठ तो पढ़ाए जाएंगे लेकिन विचार जन्म लेना बंद हो जाएंगे। यदि लोग बच्चों का उज्ज्वल भविष्य और एक सशक्त समाज बनाना चाहते हैं तो उन्हें शिक्षकों की निष्ठा पर भरोसा करना होगा और उन्हें पूरा सम्मान देना होगा।

Jansan Desh 24
Author: Jansan Desh 24

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