अंशकालिक अनुदेशकों को हाईकोर्ट से राहत, फिर होगी वापसी

 

छात्र संख्या 100 से कम होने के आधार पर नवीनीकरण से किया गया था वंचित

जनपद के 57 से अधिक अनुदेशक हुए हैं प्रभावित

कानपुर देहात। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उन अंशकालिक अनुदेशकों की सेवाओं को समाप्त करने वाले आदेशों को रद्द कर दिया है जिन्हें छात्र संख्या 100 से कम होने के आधार पर नवीनीकरण से वंचित कर दिया गया था। न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने कानपुर देहात के मनोज कुमार और अन्य द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि स्कूलों में छात्रों की संख्या में गिरावट के लिए केवल अंशकालिक अनुदेशकों को जिम्मेदार ठहराना न केवल मनमाना है बल्कि अन्यायपूर्ण भी है। कोर्ट ने कहा कि अनुदेशक का मुख्य कार्य शिक्षण कार्य करना है न कि संस्थागत मामलों का प्रबंधन करना। कोर्ट ने आगे कहा कि छात्र संख्या में कमी के पीछे कई ऐसे कारक हो सकते हैं जो अनुदेशकों के नियंत्रण से बाहर हों। मामले के अनुसार इन अनुदेशकों की नियुक्ति शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कला, स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा और कार्य शिक्षा जैसे विषयों के लिए वर्ष 2013 के शासनादेश के तहत की गई थी। शासनादेश में ऐसा कहीं भी नहीं लिखा था कि छात्र संख्या 100 से कम होने पर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी जाएगी लेकिन कई वर्षों तक सेवा देने के बाद अधिकारियों ने इस आधार पर उनका नवीनीकरण रोक दिया कि उनके संबंधित स्कूलों में छात्रों की संख्या 100 के मानक से नीचे चली गई है। याचिकाओं में दलील दी गई कि वर्ष 2013 के मूल शासनादेश के क्लाज-6 में नवीनीकरण के लिए ऐसी किसी शर्त का उल्लेख नहीं है जो छात्र संख्या घटने पर स्वतः सेवा समाप्ति की बात करती हो। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का संदर्भ दिया जिसमें कहा गया है कि अंशकालिक अनुदेशकों को नियमित शिक्षकों के समान ही माना जाना चाहिए क्योंकि वे समान योग्यता रखते हैं और पूर्णकालिक शिक्षकों की तरह कार्य भी करते हैं। उन पर अन्य कोई नौकरी न करने का प्रतिबंध भी होता है जो उन्हें वास्तव में पूर्णकालिक शिक्षक के समकक्ष बनाता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारी संस्थानों में शिक्षकों की संख्या और अन्य संसाधनों में सुधार किया जाना चाहिए ताकि वे निजी स्कूलों से प्रतिस्पर्धा कर सकें और छात्र संख्या बनी रहे, बजाय इसके कि इसका सारा दोष केवल अनुदेशकों पर मढ़ा जाए। अदालत ने अपने आदेश में पूर्व के विवादित आदेशों को दरकिनार करते हुए सक्षम अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ताओं के मामले पर नए सिरे से विचार करें। कोर्ट ने अधिकारियों को आदेश दिया है कि वे इस फैसले में दी गई टिप्पणियों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए छह सप्ताह के भीतर एक तर्कसंगत और स्पष्ट आदेश पारित करें और सेवा से वंचित किए गए सभी अनुदेशकों को पुन: कार्यभार ग्रहण कराया जाए। अनुदेशक संघ के जिलाध्यक्ष पुष्पेंद्र यादव ने बताया कि परिषदीय उच्च प्राथमिक विद्यालयों में वर्ष 2013 में शासनादेश के तहत विभिन्न विषयों के अनुदेशकों को नियुक्ति दी गई थी। कुछ वर्षों बाद कुछ अनुदेशकों की सेवाओं को विभाग ने इस आधार पर समाप्त कर दिया कि संबंधित विद्यालयों में छात्र संख्या 100 के निर्धारित मानक से कम हो गई जबकि शासनादेश में ऐसा कोई भी प्रावधान निहित नहीं था। अनुदेशकों ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने अनुदेशकों के पक्ष में फैसला दिया है। अब देखना यह है कि विभाग हमारे अनुदेशक साथियों को स्कूलों में कब कार्यभार ग्रहण करवाता है।

Jansan Desh 24
Author: Jansan Desh 24

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