बेवजह शिक्षकों को क्यों जारी की जा रही है नोटिस
कानपुर देहात। आज के प्रशासनिक और संस्थागत माहौल में ऐसा लगता है कि समय-सीमा अब काम पूरा करने के लिए नहीं बल्कि उसे और छोटा साबित करने के लिए बनाई जाती है। यदि किसी कार्य के लिए एक महीना निर्धारित है तो अगले ही दिन से यह अभियान शुरू हो जाता है कि इसे पंद्रह दिन में क्यों नहीं निपटाया जा सकता और पंद्रह दिन में पूरा हो जाए तो सवाल उठता है कि दस दिन में क्यों नहीं हुआ। मानो दक्षता का अर्थ गुणवत्ता नहीं बल्कि लगातार बढ़ती हुई जल्दबाजी रह गया हो। आजकल चल रही जनगणना जैसे कार्य इसका जीवंत उदाहरण हैं। यदि मकान गणना के लिए 22 मई से 20 जून तक का समय निर्धारित किया गया है तो स्वाभाविक रूप से यह अवधि किसी सोच-विचार, अनुभव और जमीनी आवश्यकताओं के आधार पर तय की गई होगी लेकिन वास्तविकता यह है कि कार्य शुरू होते ही हर स्तर पर एक अदृश्य प्रतियोगिता शुरू हो जाती है। कितना हुआ, कितना बाकी है, अभी तक क्यों नहीं हुआ, जल्दी भेजो, आज ही पूरा करो, शाम तक रिपोर्ट दो, रात तक अपडेट दो। मोबाइल, व्हाट्सएप समूह, फोन कॉल, वीडियो कॉन्फ्रेंस और ऑनलाइन मॉनिटरिंग का ऐसा जाल बिछा दिया जाता है कि कर्मचारी या शिक्षक कार्य कम और उसकी प्रगति का हिसाब अधिक देने लगता है। विडंबना यह है कि वही लोग जो गुणवत्ता की बात करते हैं, अक्सर वही जल्दबाजी का सबसे अधिक दबाव बनाते हैं जबकि किसी भी सर्वे, जनगणना, शैक्षिक मूल्यांकन या प्रशासनिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता का आधार उसकी गति नहीं, उसकी शुद्धता होती है। गलत आँकड़े जल्दी जमा कर देने से बेहतर है सही आँकड़े निर्धारित समय के भीतर जमा किए जाएँ लेकिन आज के माहौल में ऐसा प्रतीत होता है कि समय से पहले पूरा होना ही सफलता का प्रमाणपत्र बन गया है, चाहे उसमें कितनी ही त्रुटियाँ क्यों न रह जाएँ।
यह प्रवृत्ति केवल प्रशासनिक समस्या नहीं है, यह कार्य संस्कृति की समस्या है। लगातार निगरानी ने विश्वास की जगह ले ली है। पहले जिम्मेदार समय-सीमा देते थे और कार्यकर्ता उस सीमा के भीतर काम करता था। अब समय-सीमा के साथ हर घंटे की बेचैनी भी भेजी जाती है। परिणाम यह है कि व्यक्ति काम के प्रति नहीं, रिपोर्टिंग के प्रति उत्तरदायी महसूस करने लगता है। उसका ध्यान तथ्य जुटाने से अधिक इस बात पर रहता है कि अगला संदेश कब आएगा और क्या जवाब देना होगा।
दौड़ मुरारी दौड़ केवल एक मुहावरा नहीं बल्कि शासन और प्रबंधन का अनौपचारिक सिद्धांत बनता जा रहा है। हर कोई दौड़ रहा है और उससे भी अधिक दूसरों को दौड़ा रहा है लेकिन कोई यह पूछने को तैयार नहीं कि आखिर हम पहुँच कहाँ रहे हैं। यदि एक महीने के काम को दस दिन में निपटाने का दबाव बनाना ही उपलब्धि है तो फिर एक महीने की समय-सीमा घोषित करने का औचित्य क्या है और यदि निर्धारित अवधि वास्तव में आवश्यक है तो हर दिन जल्दबाजी का शोर क्यों?
किसी भी व्यवस्था को यह समझना होगा कि गति और गुणवत्ता हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलतीं। कई बार थोड़ी धीमी चाल ही सबसे विश्वसनीय परिणाम देती है। खेत में फसल को आदेश देकर जल्दी नहीं उगाया जा सकता, बच्चे को आदेश देकर जल्दी परिपक्व नहीं बनाया जा सकता और न ही आँकड़ों की गुणवत्ता को व्हाट्सएप संदेशों की संख्या बढ़ाकर सुधारा जा सकता है। हर काम का अपना स्वाभाविक समय होता है। जब व्यवस्था उस समय का सम्मान करना छोड़ देती है तब काम पूरा तो दिखता है लेकिन उसका सार, उसकी विश्वसनीयता और उसकी गुणवत्ता रास्ते में कहीं छूट जाती है।













