कानपुर। बच्चों की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाए गए पॉक्सो (POCSO) कानून को लेकर अब समाज और न्याय व्यवस्था में कई गंभीर सवाल उठने लगे हैं। कानपुर कोर्ट की महिला एडवोकेट एवं बार एसोसिएशन की वरिष्ठ कार्यकारी सदस्य सुमन तिवारी ने कहा कि यह कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन कुछ मामलों में इसके कथित दुरुपयोग और कमजोर जांच प्रक्रिया के कारण निर्दोष लोगों को भी लंबी कानूनी लड़ाई का सामना करना पड़ता है।उन्होंने बताया कि हाल के वर्षों में अदालतों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें आरोप सिद्ध नहीं हो सके। विभिन्न शोध रिपोर्टों और अदालतों के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कई मामलों में साक्ष्यों की कमी, गवाहों का मुकर जाना और जांच में खामियों के चलते आरोपी बरी हो जाते हैं।एडवोकेट सुमन तिवारी ने स्पष्ट किया कि हर बरी हुआ मामला झूठा नहीं माना जा सकता, क्योंकि कई बार जांच प्रक्रिया और साक्ष्य संग्रहण में गंभीर कमियां होती हैं। उन्होंने कहा कि कानून की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए निष्पक्ष जांच, डिजिटल एवं वैज्ञानिक साक्ष्यों का सही उपयोग और समयबद्ध ट्रायल बेहद आवश्यक है।उन्होंने यह भी कहा कि झूठे या कमजोर मामलों के कारण वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी होती है, जिससे समाज में कानून के प्रति विश्वास भी प्रभावित होता है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, पॉक्सो मामलों में लंबित केस और कम दोषसिद्धि दर न्याय व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।








