कानपुर देहात। पेपर लीक की परंपरा आखिर हमारे देश में कब समाप्त होगी यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है। यह परंपरा भारत में शिक्षा प्रणाली और शासन के लिए एक बहुत ही गंभीर चुनौती बन गई है। 2024 और 2026 जैसे वर्षों में नीट और यूजीसी नेट जैसी प्रमुख परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाओं ने छात्रों का भरोसा छीन लिया है। प्रत्येक वर्ष किसी न किसी बड़ी परीक्षा का पेपर लीक हो जाता है कुछ परीक्षाओं को तो सरकार निरस्त कर देती है लेकिन कुछ में अयोग्य लोगों को सफलता मिल जाती है। देश की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित नीट यूजी परीक्षा 2026 के पेपर लीक होने की घटना जितनी शर्मनाक है उससे अधिक यह दर्दनाक है। शर्मनाक इसलिए क्योंकि प्रत्येक वर्ष नीट का पेपर लीक होता है फिर भी सड़ा हुआ सिस्टम इस परीक्षा को पारदर्शी तरीके से कभी भी नहीं करवा पाता है और दर्दनाक इसलिए क्योंकि करीब 22 लाख से अधिक बच्चे परीक्षा निरस्त होने से मायूसी के शिकार हो गए हैं। शिक्षाशास्त्री प्रवीण त्रिवेदी का कहना है कि नीट 2026 परीक्षा रद्द होने की घटना कोई अचानक हुई दुर्घटना नहीं है बल्कि पिछले कई वर्षों से लगातार सामने आ रही प्रशासनिक विफलताओं, पेपर लीक, तकनीकी गड़बड़ियों और अव्यवस्थित निर्णयों की लंबी श्रृंखला का नया अध्याय है। सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि आखिर एनटीए का गठन किस उद्देश्य से किया गया था? क्या देश में पारदर्शी, विश्वसनीय और वैज्ञानिक परीक्षा प्रणाली स्थापित करने के लिए या फिर हर साल लाखों छात्रों को अनिश्चितता, तनाव और अविश्वास की आग में झोंकने के लिए? एक आरोपी द्वारा कथित रूप से 10 लाख में पेपर खरीदने और 15 लाख में बेचने जैसी बातें यदि जांच में सही साबित होती हैं तो यह केवल नकल माफिया नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था के समानांतर खड़े एक संगठित परीक्षा बाजार की तस्वीर है लेकिन इस पूरे प्रकरण का सबसे दर्दनाक हिस्सा यह नहीं कि पेपर लीक हुआ। सबसे बड़ा दर्द यह है कि 22.79 लाख छात्रों की मेहनत, मानसिक संतुलन और भविष्य को फिर से प्रयोगशाला बना दिया गया। वर्षों की तैयारी, सामाजिक दबाव, आर्थिक बोझ, कोचिंग संस्कृति की थकान और मानसिक अवसाद से गुजरते हुए छात्र परीक्षा देते हैं फिर अचानक शाम को खबर आती है परीक्षा रद्द। एनटीए की भूमिका पर सवाल इसलिए और गंभीर हो जाते हैं क्योंकि यह पहली बार नहीं है। यूजीसी नेट 2024 रद्द हुई। नीट 2024 विवादों में रही। सीयूईटी लगातार तकनीकी और प्रबंधन गड़बड़ियों से घिरा रहा। हर बार एक नई समिति, नई जांच, नया आश्वासन लेकिन हर बार परिणाम वही व्यवस्था फिर असफल, आखिर एनटीए का गठन इसलिए किया गया था कि देश की परीक्षाओं को पेशेवर और सुरक्षित बनाया जाए या इसलिए कि हर साल करोड़ों छात्रों का भरोसा टूटता रहे? 2024 के विवादों के बाद कंप्यूटर आधारित परीक्षा, डिजिटल कॉपी, एन्क्रिप्शन और सुरक्षा सुधारों की बातें हुई थीं। समितियाँ बनीं, विशेषज्ञ बुलाए गए, बड़े-बड़े दावे किए गए लेकिन 2026 में फिर वही कहानी सामने है। इसका अर्थ साफ है या तो सुधार केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित रहे या फिर संस्थागत इच्छाशक्ति ही कमजोर है। सबसे खतरनाक प्रवृत्ति यह है कि अब परीक्षा प्रणाली छात्रों के लिए अवसर से अधिक भय का प्रतीक बनने लगी है। छात्र पढ़ाई से ज्यादा यह सोचने लगे हैं कि परीक्षा होगी भी या नहीं? रिजल्ट रुकेगा तो नहीं? पेपर फिर लीक तो नहीं होगा? यह स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए शर्मनाक है क्योंकि शिक्षा व्यवस्था का पहला आधार भरोसा होता है। सच यह है कि यदि हर बड़े विवाद के बाद केवल सीबीआई जांच और उच्चस्तरीय समिति ही अंतिम प्रतिक्रिया बन जाए तो इसका मतलब है कि व्यवस्था समस्या को रोकने नहीं केवल उसके बाद बचाव करने में सक्षम रह गई है और जब किसी संस्था की पहचान लगातार गड़बड़ियों, लीक और अव्यवस्था से जुड़ने लगे, तो सवाल केवल अपराधियों पर नहीं उठते सवाल उस संस्था की क्षमता, जवाबदेही और अस्तित्व पर भी उठते हैं। अब यह मामला केवल नीट 2026 का नहीं रह गया। यह भारत की परीक्षा प्रणाली और उसमें बैठे संस्थानों की विश्वसनीयता की परीक्षा है और दुर्भाग्य यह है कि इस परीक्षा में सबसे अधिक असफल वही तंत्र दिखाई दे रहा है जिसे निष्पक्षता का प्रहरी बनाकर खड़ा किया गया था













