कानपुर देहात। आज तकनीक और ऑनलाइन व्यवस्था को प्रशासनिक पारदर्शिता और सुविधा का प्रतीक बताया जाता है लेकिन जनगणना ड्यूटी के नाम पर लागू किया गया यह तथाकथित ऑनलाइन नवाचार हजारों प्रगणकों खासतौर पर शिक्षकों के लिए राहत नहीं बल्कि मानसिक और शारीरिक अत्याचार बनकर सामने आया है। कंप्यूटर स्क्रीन पर बैठकर किए गए प्रगणक ब्लॉक और ड्यूटी के इस बेतरतीब आवंटन ने यह साबित कर दिया है कि व्यवस्था में तकनीक तो आ गई लेकिन संवेदनशीलता रास्ते में कहीं छूट गई। जिस शिक्षक की ड्यूटी उसके अपने गांव या विद्यालय क्षेत्र में लगनी चाहिए थी, उसे 5 से 10 किलोमीटर दूर दूसरे गावों में भेज दिया गया है। कुछ कर्मियों को तो एक से अधिक प्रगणक थमा दिए गए हैं, मानो वे इंसान नहीं बल्कि बिना थकने वाली मशीन हों। ऊपर से भीषण गर्मी और लू का प्रकोप अलग। सवाल यह है कि क्या ऑनलाइन सिस्टम केवल आदेश थोपने के लिए बना है या मानवीय परिस्थितियों को समझने के लिए भी।
सबसे दुखद यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में स्थानीय परिस्थितियों, स्वास्थ्य, दूरी, आवागमन और कार्य के वास्तविक दबाव का कोई मूल्यांकन दिखाई नहीं देता। शिक्षकों को इस तरह दूर दूर धूप में झोंक देना, कुछ को कम एवं कुछ को बहुत ज्यादा एरिया देना असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा है। यह नवाचार तब तक अधूरा और क्रूर है जब तक उसमें मानवीय विवेक और व्यावहारिक सोच शामिल न हो। तकनीक का उद्देश्य जीवन को सरल बनाना होता है लेकिन जब वही तकनीक बिना संवेदना के लागू की जाती है तो वह सुविधा नहीं उत्पीड़न का औजार बन जाती है। जनगणना जैसे महत्वपूर्ण कार्य की आड़ में कर्मचारियों और शिक्षकों को थकावट, तनाव और जोखिम के हवाले कर देना किसी भी संवेदनशील शासन व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता। अनुचित क्षेत्र आवंटन और कार्यभार को लेकर शिक्षक और कर्मचारी संगठन कई बार जिलाधिकारी को अवगत करा चुके हैं फिर भी कोई ध्यान नहीं दे रहा है। भीषण गर्मी की वजह से शिक्षक संगठन जनगणना को जुलाई में कराने की मांग भी कर रहे हैं हालांकि जनगणना 2027 के पहले चरण में मकान सूचीकरण व मकानों की गणना का कार्य 22 मई से 20 जून तक पूर्ण करने के निर्देश हैं।










