कानपुर देहात। शिक्षा के मैदान में सबसे बड़ा खेल सच का नहीं मुखौटों का चलता है। सरकारी हो या निजी शिक्षा दोनों जगह पूरी तस्वीर कम दिखाई जाती है, चुने हुए दृश्य ज्यादा दिखाए जाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि एक तरफ कमियों को छिपाने के लिए कुछ चमकते उदाहरण आगे कर दिए जाते हैं और दूसरी तरफ सफलता बेचने के लिए कुछ चुने हुए परिणामों का मेला लगा दिया जाता है। सरकारी शिक्षा में अक्सर कुछ ऐसे समर्पित शिक्षक सामने रख दिए जाते हैं जो सीमित संसाधनों, अव्यवस्था, गैर-शैक्षिक कार्यों और कठिन सामाजिक परिस्थितियों के बीच भी चमत्कार कर देते हैं। उन्हीं चेहरों से पूरी व्यवस्था की इमारत रंग दी जाती है लेकिन यह सवाल कोई नहीं पूछता कि यदि कुछ लोग असाधारण हैं तो बाकी तंत्र सामान्य क्यों नहीं हो पा रहा? दूसरी ओर कुछ ऐसे बच्चे और परिवार भी हैं जिनकी परिस्थितियाँ इतनी कठिन हैं कि श्रेष्ठ शिक्षक भी लगातार संघर्षरत रहते हैं। गरीबी, अभाव, अशिक्षित वातावरण, अस्थिर जीवन, श्रम का दबाव इन सबको छिपाकर केवल शिक्षक को दोष देना आसान रास्ता है। उधर निजी शिक्षा का मॉडल भी कम दिलचस्प नहीं। वहाँ कुछ तेज बच्चों, कुछ प्रशिक्षित शिक्षकों, कुछ अनुशासित परिवारों और कुछ चमकदार परिणामों को ब्रांड बनाकर पेश किया जाता है। पोस्टर पर टॉपर, मंच पर मेडल, विज्ञापन में अंग्रेजी बोलता बच्चा और पीछे की भीड़ गायब। जिन बच्चों को अलग कर दिया गया, जिन पर अतिरिक्त शुल्क का दबाव है, जो औसत हैं, जो संघर्षरत हैं उनकी कहानी बाजार के काम की नहीं होती। कड़वा सच यह है कि दोनों व्यवस्थाएँ अपने-अपने तरीके से चयनित उदाहरणों पर खड़ी छवि बेच रही हैं। एक सम्मान बचाने के लिए, दूसरी कारोबार बढ़ाने के लिए लेकिन शिक्षा उदाहरणों से नहीं, औसत बच्चे की वास्तविक प्रगति से मापी जानी चाहिए। असली सवाल यह नहीं कि दस बच्चे कहाँ पहुँचे बल्कि यह है कि शेष हजारों बच्चों के साथ क्या हुआ। जब तक हम मुखौटे हटाकर जमीनी सच नहीं देखेंगे, तब तक सुधार की हर बहस अधूरी रहेगी। सरकारी स्कूल को केवल असफल बताना झूठ है, निजी स्कूल को केवल सफल बताना भी उतना ही झूठ है। शिक्षा का सच टॉपर की मुस्कान और वायरल शिक्षक की फोटो के बीच कहीं नहीं बल्कि उस साधारण बच्चे की कॉपी में छिपा है जिसे कोई कैमरा नहीं देखता।











