पाखंडी आदर्शवाद ने डुबो दी बेसिक शिक्षा की नैया

कानपुर देहात। शिक्षा का सबसे बड़ा कबाड़ा थोथे आदर्शवाद ने किया है। यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था की गहराई तक बैठी हुई एक सच्चाई है। हमारे विद्यालयी और शिक्षा व्यवस्था में आदर्शों और सिद्धांतों के नारों की भरमार है लेकिन व्यवहार में इनका कोई स्थान नहीं दिखता। कहा जाता है कि हर बच्चा विशेष है लेकिन परीक्षा वही तय करती है कि कौन श्रेष्ठ है। शिक्षक को प्रेरक और मार्गदर्शक बनने की नसीहत दी जाती है पर वास्तविकता में उसे सरकार की अन्य गैर शैक्षणिक योजनाओं, रिपोर्टों और ऑनलाइन फीडिंग के जाल में उलझा दिया गया है, जहाँ प्रेरणा नहीं बल्कि प्रक्रिया प्रधान हो गई है। यह थोथा आदर्शवाद केवल विद्यालयों तक सीमित नहीं रहा, उसने न्यायालयों, नीतियों और समाज तीनों के भीतर अपनी जगह बना ली है। न्यायालय शिक्षा में आदर्श मानक तय करते हैं पर जिन स्कूलों में एक शिक्षक को एक साथ कई योजनाओं का डेटा अपलोड करना पड़ता है, वहाँ न्यायिक आदर्शों का पालन कैसे संभव है? शिक्षा नीतियाँ समग्र विकास की बातें करती हैं पर जब वही नीतियाँ बच्चों को मूल्यांकन की अंधी दौड़ में धकेल देती हैं तब विकास का समग्र स्वरूप खो जाता है। नीतिनिर्माताओं ने एक कल्पनालोक रचा है जहाँ हर स्कूल में पर्याप्त शिक्षक हैं, हर विद्यार्थी संसाधनों से संपन्न है और हर अभिभावक सहयोगी है जबकि वास्तविक स्थिति इसके विपरीत है। नीतियों का यह आदर्शवाद जमीनी यथार्थ से टकराकर शिक्षा को दिखावे और औपचारिकताओं का अखाड़ा बना देता है। सामाजिक आदर्शवाद ने भी शिक्षा को उलझा दिया है। माता-पिता चाहते हैं कि बच्चा संस्कारी भी बने, आज्ञाकारी भी रहे, प्रतिभावान भी दिखे और अंकतालिका में अव्वल भी आए। यह सब एक साथ चाहने की प्रवृत्ति ने बच्चे को स्वाभाविकता से दूर कर दिया है। वह गलती करने से डरता है और जहाँ गलती करने का डर है वहाँ सीखने की संभावना मर जाती है। सच्चाई यह है कि इस थोथे आदर्शवाद ने शिक्षा से ईमानदारी, प्रयोगशीलता और स्वतंत्रता को छीन लिया है। शिक्षक अब सोचने से पहले नियम देखने को विवश है क्योंकि शिक्षण का हर कदम फाइल, आदेश या पोर्टल से नियंत्रित है। बच्चों के भीतर स्वाभाविक जिज्ञासा और सृजनशीलता की जगह लक्ष्य, फॉर्मेट और परफॉर्मेंस की भाषा ने ले ली है।
अब आवश्यकता है कि शिक्षा को पाखंडी आदर्शों के बोझ से मुक्त किया जाए। आदर्श तभी सार्थक हैं जब वे यथार्थ की मिट्टी में पनपें। शिक्षक को न तो उपदेशक समझा जाए, न योजनाओं का गुलाम बल्कि एक सृजनशील मार्गदर्शक के रूप में स्वतंत्रता दी जाए। शिक्षा का उद्देश्य किसी आदर्श स्थिति का प्रदर्शन नहीं बल्कि जीवन की तैयारी है जो प्रयोग, त्रुटि और अनुभव के रास्ते से होकर गुजरती है। शिक्षा तब तक जीवित नहीं हो सकती जब तक हम उसे आदर्शों की समाधि से निकालकर बच्चों के जीवन की प्रयोगशाला में वापस न ले आएँ। थोथा आदर्शवाद वास्तव में शिक्षण की आत्मा को मारता है। समय आ गया है कि हम इस आदर्शवाद के बोझ से मुक्त होकर सच्चे यथार्थवाद को अपनाएँ जहाँ शिक्षा आदेश नहीं, अवसर देती हो और जहाँ नीति नहीं बल्कि जीवन बोलता हो।

Jansan Desh 24
Author: Jansan Desh 24

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