शिक्षकों को मिलने वाली छुट्टियाँ आखिर लोगों को क्यों खटकती हैं

 

सही जानकारी न होने के कारण लोग अक्सर शिक्षकों की छुट्टियों पर करते हैं भद्दे कमेंट

कानपुर देहात। आजकल गर्मी की छुट्टियों को लेकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो शिक्षक और बच्चे कोई राष्ट्रीय संसाधन नहीं बल्कि चौबीसों घंटे चलने वाली मशीन हों जिन्हें बस ऑन करके छोड़ देना चाहिए। छुट्टियाँ आते ही समाज का एक वर्ग और कुछ जिम्मेदार लोग ऐसे प्रतिक्रिया देने लगते हैं जैसे शिक्षा का पूरा पतन केवल गर्मी की छुट्टियों की वजह से हो रहा हो।सबसे पहले यह समझना होगा कि गर्मी की छुट्टियाँ मौज-मस्ती का बोनस नहीं बल्कि भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश की भौगोलिक और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकता हैं। 48 डिग्री तापमान में चलने वाले सरकारी स्कूलों की वास्तविकता एयरकंडीशंड दफ्तरों में बैठकर समझी नहीं जा सकती। जिन स्कूलों में पंखे केवल घूमते हैं, हवा नहीं देते जहाँ बिजली आधा दिन गायब रहती है, जहाँ बच्चे फर्श पर बैठते हैं, वहाँ मई-जून में नियमित पढ़ाई की बात करना संवेदनहीनता है शिक्षाशास्त्र नहीं। दूसरा बड़ा पूर्वाग्रह यह फैलाया जा रहा है कि शिक्षक तो वैसे भी बहुत छुट्टियाँ लेते हैं। यह कथन उन लोगों का सबसे सुविधाजनक हथियार है जिन्हें शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं। शिक्षक का काम केवल कक्षा में खड़े होकर पढ़ाना नहीं होता। चुनाव ड्यूटी, जनगणना, सर्वे, पोर्टल अपडेट, प्रशिक्षण, मिड-डे मील, अभिभावक संपर्क, रिकॉर्ड, योजनाएँ, रैलियाँ, निरीक्षण सब कुछ शिक्षक के हिस्से में डाल देने के बाद यदि कुछ दिन का अवकाश भी समाज को चुभने लगे तो समस्या छुट्टियों में नहीं मानसिकता में है। तीसरी बात छुट्टियों को केवल काम न करने से जोड़कर देखना भी गलत है। एक संवेदनशील शिक्षक के लिए यह समय आत्ममंथन, अगले सत्र की तैयारी, सामग्री निर्माण, प्रशिक्षण, पारिवारिक जिम्मेदारियों और मानसिक पुनर्संतुलन का भी समय होता है। लगातार दबाव में काम करने वाला शिक्षक यदि मानसिक और शारीरिक रूप से थक जाएगा तो उसका असर अंततः बच्चों की शिक्षा पर ही पड़ेगा लेकिन हमारे यहाँ शिक्षक को इंसान कम और हमेशा उपलब्ध रहने वाली व्यवस्था का कर्मचारी ज्यादा समझा जाने लगा है। सबसे खतरनाक बात यह है कि छुट्टियों को लेकर यह पूर्वाग्रह अक्सर उन्हीं लोगों से आता है जिनके अपने बच्चे महंगे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं जहाँ समर कैंप, हॉबी क्लास, घुमक्कड़ ट्रिप और वेलनेस ब्रेक को आधुनिक शिक्षा का हिस्सा माना जाता है लेकिन जैसे ही बात सरकारी स्कूलों और उनके शिक्षकों की आती है छुट्टियाँ अचानक राष्ट्रीय नुकसान घोषित कर दी जाती हैं। सच यह है कि समाज का एक बड़ा वर्ग अभी भी शिक्षक को अधिकार वाला पेशेवर नहीं बल्कि हर समय उपलब्ध सेवक की तरह देखना चाहता है। उसे शिक्षक की छुट्टी दिखती है लेकिन उसकी ड्यूटी नहीं, उसे अवकाश दिखता है लेकिन वह मानसिक थकान नहीं दिखती जो लगातार प्रशासनिक बोझ और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच पैदा होती है। जरूरत इस बात की है कि गर्मी की छुट्टियों को अपराधबोध की तरह नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था की आवश्यक संरचना की तरह देखा जाए क्योंकि थका हुआ शिक्षक, झुलसता बच्चा और तपते हुए क्लासरूम कभी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं दे सकते। शिक्षा केवल घंटों की गिनती से नहीं सीखने के वातावरण से बेहतर होती है।

Jansan Desh 24
Author: Jansan Desh 24

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