यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज राजनीतिक बिसात बिछाने को आतुर सम्भावित दावेदार सपा में पुराने चेहरों की वापसी से बदल सकता है राजनैतिक समीकरण
भाजपा का टिकट परिवर्तन फार्मूला हुआ हिट तो सपा का हुआ फ्लॉप टिकट बदलने से लगातार दो बार हुई सपा की हार
2012 से लगातार टिकट बदलने पर भाजपा को मिल रही सफलता
रसूलाबाद कानपुर देहात। रसूलाबाद विधानसभा क्षेत्र की करें तो यह सीट लंबे समय से राजनीतिक रूप से बेहद चर्चित रही है। कभी यह समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ मानी जाती थी, तो वहीं पिछले दो विधानसभा चुनावों से भारतीय जनता पार्टी लगातार यहां अपना कब्जा बनाए हुए है। खास बात यह रही कि भाजपा का “टिकट बदलाव फार्मूला” इस सीट पर अब तक सफल साबित हुआ है। वहीं अगर समाजवादी पार्टी की बात करें तो टिकट बदलना सपा के लिए हानिकारक रहा। जिसके चलते लगातार दो बार सपा की हार हुई।
वर्ष 2012 में अस्तित्व में आई रसूलाबाद विधानसभा सीट पर पहली बार हुए चुनाव में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवकुमार बेरिया ने जीत दर्ज कर सपा का परचम लहराया था। वह विधायक बनने के साथ ही तत्कालीन सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बने थे। उस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने बड़े चेहरे पूर्व सांसद कमलरानी वरुण को मैदान में उतारा था, जिन्हें महज 24974 मत प्राप्त हुए थे और वह तीसरे स्थान पर रहीं। उस समय प्रदेश में भाजपा का प्रदर्शन कमजोर रहा, जिसके चलते पार्टी प्रत्याशी बसपा से भी पीछे रह गईं थीं।
इसके बाद वर्ष 2017 में राजनीतिक समीकरण बदले। समाजवादी पार्टी ने शिवकुमार बेरिया का टिकट काटकर अरुणा कोरी को लड़ाया तो वहीं भाजपा ने भी नया दांव खेला। भाजपा ने बसपा छोड़कर भाजपा में आईं निर्मला संखवार को प्रत्याशी बनाया। निर्मला संखवार ने 88390 मत प्राप्त कर सपा प्रत्याशी अरुणा कोरी को हराकर पहली बार रसूलाबाद सीट पर भाजपा का परचम लहराया।
भाजपा का टिकट परिवर्तन का फैसला पूरी तरह सफल साबित हुआ। टिकट परिवर्तन करना सपा खेमे में नाराजगी का सबब बना।
इसके बाद 2022 विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने पुराने फार्मूले को दोहराया। पार्टी ने निर्मला संखवार का टिकट काटकर 2017 में बसपा से चुनाव लड़ चुकीं पूनम संखवार पर भरोसा जताया। भाजपा का यह प्रयोग भी सफल रहा और पूनम संखवार ने लगभग 3 हजार मतों की बढ़ोतरी के साथ 91783 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। इस बार सपा ने पूर्व विधायक कमलेश चन्द्र दिवाकर को टिकट दी थी जिनकी हार हुई। अब पूर्व विधायक कमलेश चंद्र दिवाकर भी भाजपा में पूरी ताकत के साथ शामिल हो गए हैं और क्षेत्र में संगठन सहित लोगों के बीच लंबे समय से बने हुए हैं। जिस तरह से लगातार दूसरी बार भाजपा ने टिकट बदलाव के दम पर सीट अपने नाम की। कुछ ऐसी ही रणनीति आगे भी हो सकती है।
वर्ष 2012 से लेकर 2022 तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में एक बार समाजवादी पार्टी और दो बार भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली है। अब सभी की निगाहें 2027 विधानसभा चुनाव पर टिक गई हैं। समाजवादी पार्टी अपनी खोई हुई सीट वापस पाने की रणनीति तैयार कर रही है, जबकि भाजपा लगातार तीसरी बार जीत दर्ज कर हैट्रिक बनाने की कोशिश में जुटी हुई है।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो जातीय समीकरण भाजपा के पक्ष में मजबूत माने जाते हैं, लेकिन कन्नौज लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा होने के कारण यहां समाजवादी पार्टी का प्रभाव भी कम नहीं है। भाजपा जहां हर दांव-पेंच अपनाने की तैयारी में है, वहीं सपा भी किसी अनुभवी और मजबूत चेहरे को मैदान में उतार सकती है।
फिलहाल दोनों दल पूरी सक्रियता के साथ क्षेत्र में जुटे हुए हैं। भाजपा में टिकट को लेकर अभी से मंथन शुरू हो चुका है तो वहीं समाजवादी पार्टी भी किसी अनुभवी व मज़बूत चेहरे पर अपना दाँव खेल सकती है।










