कालपी (जालौन) विघ्नहर्ता मंगल करता और बुद्धि विवेक के देवता भगवान श्री गणेश की आराधना का पर्व गणेश चतुर्थी देश भर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है ।भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होने वाला यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक एकता संस्कृति संरक्षण और आपसी भाईचारे का संदेश भी देता है। क्यों मनाई जाती है गणेश चतुर्थी
साथियों धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणेश जी भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र तथा प्रथम पूज्य देवता हैं।किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश जी की पूजा करने की परंपरा है। उन्हें विघ्नहर्ता बुद्धि ज्ञान और शुभारंभ के देवता के रूप में पूजा जाता है। यही कारण है कि गणेश चतुर्थी पर लोग सुख समृद्धि सफलता और परिवार में मंगल की कामना करते हैं। मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करने से लेकर पूजा अर्चना आरती और अंत में विसर्जन तक की परंपरा जीवन के उस दर्शन को भी दर्शाती है कि प्रकृति से प्राप्त वस्तु अंततः प्रक्रति में ही विलीन हो जाती है। इसी कारण आज पर्यावरण अनुकूल मिट्टी की प्रतिमाओं और प्राकृतिक रंगों से गणेश उत्सव मनाने पर भी जोर दिया जा रहा है ।
कहां से शुरू हुआ गणेशोत्सव
गणेश चतुर्थी कब पहलीबार मनाई गई इसका कोई निश्चित ऐतिहासिक वर्ष उपलब्ध नहीं है।गणेश पूजा भारत में प्राचीनकाल से चली आ रही है और विभिन्न पुरातात्विक तथा धार्मिक श्रोतों से गणेश जी की आराधना के प्रमाण मिले हैं।
सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव मनाने की परम्परा का सम्बन्ध महाराष्ट्र के पुणे से जोड़ा जाता है।छत्रपति शिवाजी महाराज के समय पुणे में गणेशोत्सव सार्वजनिक रूप से मनाए जाने के उल्लेख मिलते हैं। बाद में पेशवा काल में भी गणेश जी की पूजा को संरक्षण मिला। और पुणे में यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन बना।
हालांकि हाल के ऐतिहासिक शोध में यह दावा भी सामने आया है कि समर्थ गुरू रामदास स्वामी ने शिविर के सुंदरमठ में 17 वीं शताब्दी में आम लोगों के लिए गणेशोत्सव आयोजित किया था। इस शोध के अनुसार यह आयोजन 1675से1677 के बीच हुआ हो सकता है। इसलिए सार्वजनिक गणेशोत्सव के सबसे पहले आयोजक के रूप मे केवल एक व्यक्ति का नाम निश्चित रूप से लिखना इतिहास की द्रष्टि से उचित नहीं होगा।लोकमान्य तिलक ने गणेशोत्सव को बनाया जन आंदोलन
आज जिस बड़े और सार्वजनिक स्वरूप मे गणेशोत्सव मनाया जाता है उसे लोकप्रिय बनाने में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
1890के दशक में अंगेजी शासन के दौरान सार्वजनिक राजनीतिक सभाओं और बड़े जमावड़ो पर कई तरह के प्रतिबंध थे ।ऐसे समय में तिलक ने गणेशोत्सव को धार्मिक आयोजन के साथ साथ समाज को एकजुट करने और राष्ट्रीय चेतना जगाने का माध्यम बनाया।1883के आसपास पुणे और महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेशोत्सव को बड़े स्तर पर संगठित स्वरूप मिला।
गणेश उत्सव के पंडाल में धार्मिक कार्यक्रम के साथ-साथ भजन कीर्तन नाटक व्याख्यान सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामाजिक जागरूकता के आयोजन होने लगे। अलग-अलग वर्गों के लोग एक साथ आने लगे और धीरे-धीरे यह पर्व महाराष्ट्र के से निकलकर देश के अनेक हिस्सों में लोकप्रिय हो गया। कालपी का प्राचीन गणेश मंदिर भी इतिहास से जुड़ा जालौन जिले की ऐतिहासिक नगरी कालपी में स्थित प्राचीन गणेश मंदिर की अपनी अलग ऐतिहासिक पहचान है। उपलब्ध स्थानीय ऐतिहासिक विवरण के अनुसार मंदिर में गणेश प्रतिमा की स्थापना छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु समर्थ रामदास से जुड़ी बताई जाती है। स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार मंदिर का निर्माण 1569 में समर्थ गुरू रामदास के कालपी आगमन से जोड़ा जाता है। बाद में मराठा शासक पेशवा बाजीराव प्रथम द्वारा मंदिर के जीर्णोद्वारा और सुंदरीकरण का उल्लेख मिलता है। इसी वजह से कालपी का यह प्राचीन गणेश मंदिर धार्मिक अवस्था के साथ-साथ मराठा इतिहास की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
धर्मानुरागी सज्जनों आज गणेशोत्सव केवल पूजा और उत्सव तक सीमित नहीं है यह धर्म, संस्कृति , सामाजिक एकता, कला, संगीत और पर्यावरण संरक्षण को जोड़ने वाला पर्व बन गया है।गणेश प्रतिमा की स्थापना से लेकर विसर्जन तक बड़ी संख्या मे लोग सामूहिक रूप से भाग लेते हैं।
गणेशोत्सव का वास्तविक उद्देश्य यही माना जा सकता है कि समाज में सद्भाव भाईचारा और एकता कायम हो। बुराईयों व विघ्नों का नाश हो तथा ज्ञान विवेक और सकारात्मक सोच का विकास हो।
आर० एन० शुक्ला पत्रकार










