उरई। दयानंद वैदिक कॉलेज, उरई के मनोविज्ञान विभाग द्वारा विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर एक जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जो प्रतिवर्ष 10 सितंबर को विश्वभर में मनाया जाता है। यह कार्यक्रम वर्तमान त्रैवार्षिक थीम (2024-2026) “आत्महत्या पर बदलता दृष्टिकोण” तथा इसके आह्वान “बातचीत की शुरुआत करें” के अनुरूप आयोजित किया गया।
इस कार्यक्रम का आयोजन कनेक्टिंग संस्था, पुणे (Connecting NGO, Pune) द्वारा करवाया गया, जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में विक्रम पवार एवं दीपा मदन ने अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। यह कार्यक्रम ऑनलाइन एवं ऑफलाइन दोनों माध्यमों से आयोजित किया गया, तथा ऑफलाइन कार्यक्रम छत्रसाल सभागार में संपन्न हुआ।
मुख्य वक्ता के रूप मे उपस्थित विक्रम पवार और दीपा मदन ने अपने वक्तव्य में मानसिक तनाव एवं आत्महत्या की प्रवृत्ति से जुड़े चेतावनी संकेतों, उनके संभावित कारणों तथा उनसे निपटने के प्रभावी तरीकों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि व्यवहार में अचानक परिवर्तन, सामाजिक दूरी, नींद व भूख में असंतुलन, तथा निराशा भरी बातें जैसे संकेतों को समय रहते पहचानना कितना महत्वपूर्ण है, और साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि पीड़ित व्यक्ति से संवेदनशील एवं गैर-निर्णयात्मक ढंग से संवाद स्थापित करना तथा उन्हें उचित सहयोग व सहायता तक पहुँचाना किस प्रकार संकट की घड़ी में सहायक सिद्ध हो सकता है।
मुख्य वक्ताओं ने कनेक्टिंग की डिस्ट्रेस हेल्पलाइन (9922004305; 9922001122) जैसे संदर्भ स्रोतों की जानकारी भी साझा की गई।
महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो0 राजेश चन्द्र पाण्डेय ने अपने संबोधन में कहा कि स्वस्थ शरीर और मन के लिए उचित आहार, नियमित नींद तथा व्यायाम अत्यंत आवश्यक हैं और इन्हीं मूल आधारों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने भारतीय शास्त्रों में निहित ज्ञान की प्रासंगिकता पर भी बल दिया और कहा कि ईश्वर के प्रति आस्था व्यक्ति को मानसिक संबल एवं जीवन की चुनौतियों से जूझने की शक्ति प्रदान करती है।
इस कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्राचार्य, IQAC संयोजिका, अल्का रानी पुरवार, मनोविज्ञान विभाग प्रभारी, डॉ माधुरी रावत, डॉ राजेश पालीवाल, डॉ श्रवण कुमार त्रिपाठी, डॉ गौरव यादव, डॉ गिरीश श्रीवास्तव, डॉ लक्ष्मी गुप्ता, डॉ श्रीप्रकाश पाण्डेय, डॉ शगुफ्ता मिर्जा, शुभ प्रिया पाल और बी.ए., एम.ए., बी.एस.सी, बी.एड. के विद्यार्थी उपस्थित रहे।
विद्यार्थियों ने भी अपने मन की बात खुलकर साझा की और कई प्रश्न पूछे।
इस कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को यह स्पष्ट संदेश दिया कि एक सम्मानजनक, गैर-निर्णयात्मक बातचीत किसी की जान बचा सकती है, तथा मानसिक स्वास्थ्य के प्रति चुप्पी तोड़ना एक सामूहिक जिम्मेदारी है।















