कालपी जालौन – ग्राम महेवा में रामजानकी मंदिर में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के छठवे दिन वुधवार को कथाव्यास श्री राम श्याम जी महाराज ने गोवर्धन लीला के साथ भगवान श्री कृष्ण रुक्मिणी विवाह का रोचक प्रसंग सुनाया। श्रोता भाव विभोर हुए।
कथा व्यास राम श्याम जी ने कहा भगवान ने अपनी लीलाओं से जहां कंस के भेजे विभिन्न राक्षसों का संघार किया वहीं ब्रज के लोगों को आनंद प्रदान किया महाराज जी ने बच्चों के संस्कार पर वशेष जोर डाला कि बच्चों में शिक्षा के साथ संस्कार भी जरूरी है जब बच्चों में संस्कार होंगे तो माता पिता की सेवा और बडों का आदर भी करेंगे आगे भगवान श्रीकृष्ण की पौराणिक कथा के अनुसार एक दिन श्री कृष्ण ने देखा कि सभी बृजवासी तरह-तरह के पकवान बना रहे हैं।पूजा का मंडप सजाया जा रहा है और सभी लोग प्रातः काल से ही पूजन की सामग्री एकत्रित करने में व्यस्त है, तब श्रीकृष्ण ने यशोदा जी से पूछा मइया आज सभी लोग किसके पूजन की तैयारी कर रहे हैं ? इस पर मइया यशोदा ने कहा कि पुत्र सभी बृजवासी इंद्रदेव के पूजन की तैयारी कर रहे हैं । तब कान्हा ने कहा कि सभी लोग इंद्र की पूजा क्यों कर रहे हैं ? इस पर माता यशोदा ने उन्हें बताते हुए कहती हैं इंद्रदेव वर्षा करते हैं जिससे अन्य की पैदावार अच्छी होती है और हमारी गायों को चारा प्राप्त होता है । इस पर कान्हा ने कहा कि वर्षा करना तो इंद्र देव का कर्तव्य है। यदि पूजा करनी है तो हमें गोवर्धन पर्वत की करनी चाहिए। क्योंकि हमारी गायें तो वहीं चरती है और हमें फल,फूल ,सब्जियां आदि गोवर्धन पर्वत से प्राप्त होती है और गोवर्धन भगवान ही मेरी रक्षा करते है अतः हमें गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए इसके बाद सभी बृजवासी इंद्रदेव की बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे इस बात को देवराज इंद्र ने अपना अपमान समझा और क्रोध में आकर प्रलय दायक मूसलाधार बारिश शुरू कर दी जिससे चारों ओर त्राहि-त्राहि होने लगी । सभी अपने परिवार और पशुओं को बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे तब बृजवासी कहने लगे कि यह सब कृष्ण की बात मानने का कारण हुआ है अब हमें इंद्रदेव का कोप सहना पड़ेगा। इसके बाद भगवान कृष्ण ने इंद्रदेव का अहंकार दूर करने और सभी बृजवासियों की रक्षा करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया तब सभी बृजवासियों ने गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण ली । इसके बाद इंद्रदेव को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने कृष्ण से क्षमा याचना की उसी के बाद से गोवर्धन पूजा पूजन की परंपरा आरंभ हुई। इस मौके पर गोवर्धन लीला की झांकी भी सजाई गई और अन्त में भगवान के विवाह की कथा सुना कर कथा को विश्राम दिया इस कथा के मुख्य यजमान – शर्मा देवी जी एवं कथा आयोजक – तेज सिंह चौहान,लक्ष्मण सिंह चौहान,जय प्रकाश चौहान सतपाल सिंह सहित भारी संख्या में श्रोतागण मौजूद रहे।









