प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाएं और अपने आसपास के अन्य किसानों को भी इसके लिए करें प्रेरित:-मुख्य विकास अधिकारी
कानपुर देहात। जिला गंगा समिति, कानपुर देहात के तत्वावधान में जिलाधिकारी कपिल सिंह के निर्देशानुसार विकास भवन सभागार, कानपुर देहात में मुख्य विकास अधिकारी विधान जायसवाल की अध्यक्षता में एक दिवसीय प्राकृतिक खेती कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का आयोजन प्रभागीय वनाधिकारी प्रोमिला के मार्गदर्शन तथा जिला परियोजना अधिकारी, जिला गंगा समिति विवेक कुमार सैनी के नेतृत्व में किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य किसानों को प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूक करना तथा कम लागत में गुणवत्तापूर्ण एवं सुरक्षित कृषि उत्पादन के साथ-साथ मृदा, जल एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रेरित करना था। कार्यक्रम में उप प्रभागीय वनाधिकारी डॉ. अपूर्वा पाण्डेय, उप कृषि निदेशक हरिशंकर भार्गव, जिला उद्यान अधिकारी डॉ. बलदेव, जिला कृषि अधिकारी प्राची पाण्डेय, कृषि विशेषज्ञ डॉ. खलील, डॉ. आर.एन. आर्य तथा डॉ. शशिकान्त सहित अन्य विशेषज्ञों ने किसानों को प्राकृतिक खेती की विभिन्न तकनीकों की विस्तृत जानकारी प्रदान की। इस अवसर पर मुख्य विकास अधिकारी विधान जायसवाल ने अपने संबोधन में कहा कि प्राकृतिक खेती वर्तमान समय की आवश्यकता है। यह खेती किसानों की उत्पादन लागत को कम करने के साथ-साथ भूमि की उर्वरता बनाए रखने, पर्यावरण संरक्षण तथा मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती को अपनाकर किसान रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों पर निर्भरता कम कर सकते हैं तथा दीर्घकालिक रूप से अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं। उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि वे प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाएं और अपने आसपास के अन्य किसानों को भी इसके लिए प्रेरित करें, जिससे जनपद में टिकाऊ एवं पर्यावरण अनुकूल कृषि प्रणाली को बढ़ावा मिल सके।
विशेषज्ञों ने बताया कि प्राकृतिक खेती में स्थानीय एवं प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से खेती की लागत में कमी लाई जा सकती है तथा भूमि की उर्वरता और जैव विविधता को संरक्षित रखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों पर निर्भरता कम कर प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग करने से कृषि अधिक टिकाऊ और लाभकारी बन सकती है।
कार्यशाला में किसानों को जीवामृत, घनजीवामृत, बीजामृत, प्राकृतिक कीट नियंत्रण, मल्चिंग, मिश्रित खेती एवं बहुफसली खेती जैसी तकनीकों के बारे में जानकारी दी गई। साथ ही प्राकृतिक खेती के माध्यम से फसलों की गुणवत्ता बढ़ाने, उत्पादन लागत घटाने तथा पर्यावरण संरक्षण में योगदान देने के उपायों पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
वक्ताओं ने कहा कि प्राकृतिक खेती केवल एक कृषि पद्धति नहीं, बल्कि मृदा स्वास्थ्य, जल संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा एवं किसानों की आय में वृद्धि की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। गंगा नदी एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देकर कृषि भूमि में रासायनिक पदार्थों के प्रयोग को कम किया जा सकता है तथा जल स्रोतों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।
कार्यशाला के दौरान किसानों को उप प्रभागीय वनाधिकारी अपूर्वा पाण्डेय द्वारा कार्बन क्रेडिट स्कीम के बारे में विस्तार से जानकारी दी साथ ही ज्यादा से ज्यादा किसानों को लाभाविन्त होने हेतु जागरूक किया।
कार्यशाला में कृषि बैज्ञानिको द्वारा किसानों की जिज्ञासाओं एवं समस्याओं का समाधान करते हुए उन्हें प्राकृतिक खेती अपनाने हेतु आवश्यक मार्गदर्शन एवं सुझाव दिए गए। किसानों से अपील की गई कि वे प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाकर स्वस्थ एवं सुरक्षित खाद्यान्न उत्पादन के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी प्रतिभागियों ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने तथा अधिक से अधिक किसानों को इसके प्रति जागरूक करने का संकल्प लिया। यह कार्यशाला स्वच्छ एवं अविरल गंगा तथा पर्यावरण संरक्षण के व्यापक उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए आयोजित की गई।












