कानपुर देहात। शिक्षकों के गिरते मानसिक स्वास्थ्य और उन पर बढ़ते प्रशासनिक दबाव को लेकर बातें तो बहुत होती हैं लेकिन व्यवस्था स्तर पर इसे शायद ही कभी स्वीकार किया जाता है। आज का शिक्षक केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं रह गया है वह डेटा एंट्री ऑपरेटर, सर्वे एजेंट, चुनाव कर्मचारी और योजनाओं का कार्यकर्ता बनकर रह गया है। इस पेशेवर विखंडन ने शिक्षक की मूल पहचान को ही धुंधला कर दिया है।
सुबह स्कूल पहुंचने से पहले ही शिक्षक किसी नए आदेश, फॉर्म या अचानक निरीक्षण के डर से तनावग्रस्त हो जाता है। डिजिटल ऐप्स और पोर्टल, जिन्हें काम आसान बनाने के लिए लाया गया था, बिना प्रशिक्षण और नेटवर्क की समस्याओं के कारण शिक्षकों के लिए तकनीकी गुलामी बन चुके हैं। हर गलत क्लिक पर शो-कॉज नोटिस का डर उनकी स्वाभाविक क्षमता को प्रभावित कर रहा है। व्यवस्था ने शिक्षक को एक ऐसी इम्प्लीमेंटेशन मशीन मान लिया है जिसमें संवेदनाओं, सीमाओं और व्यक्तिगत जीवन के लिए कोई जगह नहीं बची है। वहीं दूसरी ओर किसी भी शैक्षणिक विफलता का दोष सीधे शिक्षक पर मढ़ देना उनके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाता है और समाज के साथ अविश्वास की खाई को बढ़ाता है। इस संकट से निपटने के लिए केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि ठोस बदलावों की आवश्यकता है। शिक्षकों को केवल शिक्षण कार्य तक सीमित रखा जाए और गैर-शैक्षणिक बोझ हटाया जाए। तनाव को व्यक्तिगत कमजोरी न मानकर सिस्टम की जिम्मेदारी माना जाए और नियमित काउंसलिंग उपलब्ध कराई जाए। तकनीक को शिक्षक का सहायक बनाया जाए निरीक्षक नहीं। पहले प्रशिक्षण दिया जाए फिर क्रियान्वयन हो। नीति निर्माण में शिक्षकों को मुख्य हितधारक मानकर उनकी आवाज सुनी जाए। बता दें आज शिक्षक थका हुआ जरूर है लेकिन उसका समर्पण जिंदा है। समाज और सरकार को यह समझना होगा कि यदि शिक्षक का मन स्वस्थ नहीं होगा तो शिक्षा कभी स्वस्थ नहीं हो सकती इसलिए शिक्षक को केवल सिस्टम का पुर्जा नहीं बल्कि समाज का सच्चा निर्माता मानना होगा।









