कालपी (जालौन) पतंगबाजी का इतिहास अत्यंत प्राचीन है यह खेल करीब 2600 वर्ष पुराना खेल है। पतंगबाजी के खेल का प्रारंभ ईसा से 400 वर्ष पूर्व यूनान के प्राचीन नगर तारतारन मे हुआ था । इसका आविष्कार हकीम अरकीफोस द्वारा हुआ इस आविष्कार का आधार यह था कि मानव दवाओं के बिना खेलकूद और मनोरंजन मे भाग लेकर स्वस्थ रह सकता है । उस काल से पतंगबाजी का प्रचार बराबर होता गया और विश्व के कोने कोने मे पतंगबाजी की दुंन्दभी मचती रही । आधुनिक युग प्रगतिवादी युग है । मानव की प्रगति के साथ पतंगबाजी भी प्रगति के पथ पर कहीं कहीं अग्रसर हो रही है लेकिन बुंदेलखंड मे इसकी प्रगति प्रायः लुप्त होती जा रही है ।
प्राचीनकाल मे पतंगबाजी का उल्लेख पुराण, वेद और रामायण मे भी मिलता है । देश विदेश मे पतंगबाजी के खेल को विभिन्न ढंग से अपनाया है इसका तरीका रंगीन है । भारत मे पतंगबाजी के खेल का विकास मुगलकाल से प्रारंभ होता है भारत मे इस खेल का तरीका अलग है पतंग पतले कागज की बनी होती है इसकी चौड़ाई व लम्बाई 30 से 60 से. मी. तक होती है यह एक धागे या डोरे से उड़ाई जाती है । पतंगबाजी के खेल मे आकर्षण तो है ही परन्तु उससे अधिक आकर्षण है पतंगबाजी के पेंच मे । अखिल भारतीय टूर्नामेंट के भी आयोजन किये जाते हैं पतंगबाजी का खेल अपने मे अलौकिक आकर्षण लिए हुए है । वहीं पतंग बनाना भी एक कला है ।
बुंदेलखंड भारत में सदैव ही प्रत्येक क्षेत्र मे अग्रणी रहा है और बुंदेलखंड में पतंगबाजी का विकास भी मुगलकाल से प्रारंभ होता है बुन्देलखंड के राजा महाराजा और नबाब पतंगबाजी के खेल मे भाग लेते आये हैं । बुंन्देलखंड के प्रसिद्ध पतंगबाज बल्देव प्रसाद उर्फ बल्ले माते तथा हकीम मुहम्मद आबिद हसन भोपाली उर्फ हकीम जी थे । प्रायः पतंगबाजी की प्रतियोगिता इन्हीं दोनों मे होती थी ये कुशल पतंगबाज थे । इनके द्वारा उड़ाई हुई पतंगें आसमान मे झूमती हुई नजर आती थीं और पतंगबाज पेंच लड़ाते समय दूसरी पतंग को काट देता है तब सर्बत्र हर्ष की लहर छा जाती है और वो काटा के शब्द वायुमंडल मे ध्वनित हो जाते हैं । इसके बाद भी पतंगबाजी का खेल यही ं तक समाप्त नहीं हो जाता किन्तु पतंग लूटने मे जो जोश, उमंग, आवेश, उत्साह बालकों मे होता है वह उत्साह दुनियां के किसी खेल मे नहीं पाया जाता ।
बल्लू माते बुन्देलखण्ड के झांसी क्षेत्र के निवासी थे वे घर के धनी व्यक्ति और जमीदार थे बचपन मे ही उनको पतंगबाजी का शौक था और यह शौक उनका बुढापे तक नहीं छूटा । हकीम जी भी पतंग उड़ाने मे बड़े माहिर थे इनके हाथों मे वह कमाल कि पतंग इनके हाथों मे नाचती हुई नजर आती थी । बुन्देलखण्ड मे अखिल भारतीय स्तर के पतंगबाज रहे हैं जिन्होंने अपनी अलौकिक साधना द्वारा पतंगबाजी के खेल मे अत्यधिक प्रगति की है इन पतंगबाजों के नाम सेठ कथूले ऊर्फ कत्थू, उस्ताद खुदा बक्स झांसी , हबीब ग्वालियर, पपैया जी ग्वालियर, उस्ताद धूमे खां ग्वालियर आदि । बुन्देलखण्ड के प्रवेश द्वार कालपी का दुर्भाग्य
कालपी- दुर्भाग्य से वर्तमान राजनीति ने इस यशस्वी भूमि के साथ न्याय नहीं किया । सत्तात्मक राजनीति ने इसके इतिहास पर पर्दा डाल दिया और और उसके साहित्य तथा संस्कृति को विस्मृति के गर्त मे धकेल दिया ।
कालपी मे दो स्थानों क्रमशः शीतलादेवी मंदिर एवं चिल्ला मदार साहब की मजार पर होने वाली पतंग प्रतियोगिता आज प्रायः विलुप्त हो चुकी है जहां बहुत दूर दूर से पतंगबाज आया करते थे और बड़ी बड़ी बाजियां लगती थीं । शीतलादेवी मे होली की रंगपंचमी में और मदार साहब पर बसंत पंचमी के दिन पतंग प्रतियोगिता हुआ करती थी ।











