उरई (जालौन)। जनपद जालौन के कुठौंद थाने में तीन साल से अधिक समय से डटे सिपाहियों का मामला अब केवल नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह क्षेत्र में गहरे खौफ का कारण बन चुका है। स्थानीय जनता इन पुलिसकर्मियों के रवैये से बुरी तरह त्रस्त है, लेकिन उनके खिलाफ आवाज उठाने या उच्च अधिकारियों से शिकायत करने की हिम्मत किसी में नहीं है।थाने में ‘अघोषित साम्राज्य’ और जनता में भयसूत्रों के अनुसार, एक ही थाने में लंबा समय बीत जाने के कारण इन सिपाहियों ने अपना एक मजबूत स्थानीय नेटवर्क और अघोषित साम्राज्य स्थापित कर लिया है। क्षेत्र के लोगों में यह डर बैठ गया है कि यदि उन्होंने इन पुलिसकर्मियों की शिकायत की, तो उन्हें किसी न किसी फर्जी मामले या जांच में फंसाकर प्रताड़ित किया जा सकता है। पुलिस के इसी संभावित बदले (Vindictive Action) के डर से लोग चुपचाप सब कुछ सहने को मजबूर हैं।उच्च अधिकारियों की चुप्पी पर उठ रहे सवालपीड़ित जनता का कहना है कि जब रक्षक ही भक्षक का रूप ले ले, तो गुहार किससे लगाई जाए? इस माहौल ने पुलिस और जनता के बीच के विश्वास को पूरी तरह खत्म कर दिया है। सवाल यह उठता है कि क्या जालौन के पुलिस अधीक्षक (SP) और अन्य आला अधिकारी इस जमीनी हकीकत और जनता के मन में व्याप्त इस भय से पूरी तरह अनजान हैं? या फिर जानबूझकर जमीनी स्तर पर पनप रहे इस उत्पीड़न को नजरअंदाज किया जा रहा है?कानून का राज स्थापित करने के लिए यह बेहद जरूरी है कि उत्तर प्रदेश पुलिस के मुखिया और जालौन के वरिष्ठ अधिकारी इस मामले में खुद हस्तक्षेप करें। इन सिपाहियों को तत्काल प्रभाव से हटाकर एक निष्पक्ष जांच कराई जाए, ताकि कुठौंद क्षेत्र की जनता भयमुक्त होकर सांस ले सके।









