बुंदेलखंड ने भारत के उत्थान मे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

कालपी (जालौन) बुंदेलखंड ने भारत के उत्थान मे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है यहाँ का अतीत अत्यंत गौरवपूर्ण है । यहाँ साहित्य , संगीत और कला की अनुपम लहरें प्रभावित होती रहती हैं इसी भूखण्ड मे पग पग.पर एक विचित्र इतिहास छिपा है । यहाँ के असंख्य दुर्गों और मंदिरों के भग्नावशेष अपनी मौन वाणी मे बुंदेलखंड के गौरव.एवं यश की रागिनी अलापते रहते हैं ।
आज बुंदेलखंड इतना गौरवशाली प्रदेश होते हुए भी सभी प्रदेशों मे एक पिछड़ा हुआ प्रदेश है इसका वर्तमान स्पृहणीय नहीं है बुंदेलखंड को आज नया प्रांत नहीं बनाया जा रहा है ।
……बुंदेलखंड के वातावरण मे झांसी की कसक, दतिया की ठसक, बांदा की अकड़ और जालौन की पकड़ आज भी अपनी वासतविकता का परिचय देती है । बुंदेलखंड के बारे मे एक कहावत भी प्रचलित है ” सौ दंडी और एक बुंदेलखंडी ” जो बुंदेलखंड के संबंध मे चरितार्थ होती है।

बुंदेलखंड के विकास मे सरकार गतिशील नहीं
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बुंदेलखंड का अस्तित्व बहुत प्राचीन ऐतिहासिक काल से है । हां काल के प्रभाव से यह इस समय विखर गया है तथा असंगठित है । यहां के निवासी निर्धन हैं । यहां की ग्रामीण जनता मे निर्धनता , अशिक्षा और अंध विश्वास के पैर जमे हुए हैं । यहां उद्योगों की कमी है और इस प्रदेश के विकास मे सरकार गतिशील नहीं है और इसकी सदैव ही उपेक्षा होती रही है । जन जागरण, चेतना और उद्योगों के विकास के लिए सरकार को कदम उठाना चाहिए और तभी यह प्रदेश भी भारत की प्रगति मे अपना कदम मिलाकर अपना महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान कर सकेगा ।
बुंदेलखंड का प्रथक अस्तित्व तथा प्रांत निर्माण यहां की जनता के विकास की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है और यह विकसित प्रदेश भारत के विकास मे भी अधिक सहायक होगा । बुंदेलखंड का प्रथक अस्तित्व स्वीकार किया जाना बुंदेलीभाषा -भाषी राज्य का गठन , ऐतिहासिक पृष्ठभूमि , रीति-रिवाज भाषा आदि सभी दृष्टियों से आवश्यक है क्योंकि इस भूभाग के दो राज्यों (उतर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश) मे विभाजित होने से दोनों ही मे न तो इसका कोई अस्तित्व ही है और न आवाज । न तो मंत्रिमंडलों मे पर्याप्त प्रतिनिधित्व ही इसे प्राप्त होता है और न योजना कार्यों मे भी इसे महत्व मिलता है ।

बुंदेलखंड प्रांत निर्माण की आवाज
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वीरसिंह जूदेव द्वितीय ने विशाल भारत कलकत्ता से हिन्दी साहित्य के महारथी पं० बनारसी दास चतुर्वेदी को विशेष आग्रह करके यहां आमंत्रित किया था अक्टूबर 18 – 1837 से निरंतर 14 वर्षों तक उनकी साधना भूमि रहा यहीं उनके सम्पादकत्व मे “मधुकर” बुंदेलखंड का लोकप्रिय पाक्षिक अपनी दुंदुभि मचा चुका है । श्री बनारसी दास चतुर्वेदी ने मधुकर पाक्षिक के 1 जनवरी 1943 से 16 मई 1943 तक के बुंदेलखंड प्रांत निर्माण अंक मे बुंदेलखंड प्रांत निर्माण आंदोलन की आवाज बुलंद की थी ।

Jansan Desh 24
Author: Jansan Desh 24

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