कालपी (जालौन) पुराणों मे वर्णित इतिहास के स्वर्ण पन्नों में अंकित वह नगर जो कालप्रिया से लेकर कालपी नाम पड़ने तक हजारों वर्षों का सफर तय कर चुका जिसने महाभारत काल से पहले अपना सफर शुरू किया जिस पावन पवित्र नगर में भगवान विष्णु ने पिता पाराशर मां मत्स्य गंधा के गर्भ से उत्पन्न होकर हिन्दू वेद पुराणों और विश्व भर में मान्य गीता जैसे ग्रन्थों की रचना कर इस धरा को ज्ञान विज्ञान दिया जन्म म्रत्यु का बोध कराया । जिस महानगर को उत्तर भारत का प्रमुख धनाढ्य और व्यापारिक स्थल होने का गौरव मिला जिस नगर में अधिपत्य स्थापित करने के लिए अनगिनत राजा महाराजाओं नें जंग लड़ी जिस कस्बे को पाने के लिए मुगल शासक हमेशा लालायित रहे और लड़ाईयां लड़ी जिस महान नगर को पाने के लिए फिरंगियों ने अपने हजारों सैनिक कुर्बान कर दिए जिस वीर भूमि पर क्रांतिकारियों ने देश की आजादी का प्रमुख केन्द्र बनाया । जिस जमीं को मुस्लिम सूफी उलेमाओं ने शरीफ कह कर इबादत की ।
आज ऐसी पावन पाक और पवित्र नगरी अपनी पहचान खो चुकी है यहां के पौराणिक ऐतिहासिक स्थल धूल धूषित हो गए स्थापत्य काल की इमारते हवेलियों की पहचान मिट गई। सदियों से लुटने वाली कालपी के पास आज एक भीनी सी चादर भी नहीं जो अपने घायल बदन को ढक सके। यहां के खजाने लुट गए यहां के व्यापार लुट गए यहां के उद्योग धंधे लुट गए। अब बचा ही क्या है बगैर मांस के हड्डियों का ढांचा वो भी दफन की वाट जोह रहा है।
अब तो यहां के कलम कारों की कलम भी थक गई लिखते लिखते स्याही भी सूख गई अब आंखों में आंसू भी नहीं बचे जो किसी को दिखा सके। यहां के लोगों के गले भी इतनी बुरी तरह सूख गए कि अपने अधिकार अपनी बदहाली को सुनाने के लिए आवाज भी निकलनी बन्द हो गई। एक बेबस लाचार व्रद्ध कालपी अब और जीना नहीं चाहती हे दिल्ली लखनऊ के राज सिंहासन पर बैठे नेता रूपी राजा धिराजा हे पालनहार आखिरी मुराद है कालपी की अब तो इच्छा म्रत्यु दे दो कहां तक बैटीलेटर मे पड़े पड़े ऊपर वाले से मौत मांगे अरे कलयुग के भगवान आप के हाथों से ही उद्धार हो जाए यही बस एक तमन्ना शेष बची है ।
जो था लुट गया जो बचा है लुट रहा है
वन विभाग ने हमें बुरी तरह जकड़ लिया हाथ पैर भी नहीं पसार सकते।नेशनल हाईवे मेरा सीना चीरता हुआ निकल गया डबल रेल लाइन है बड़ा सा रेलवे स्टेशन है पर गाड़ियां सिर्फ निकलते देख सकते है पूरी रफ्तार से सटी बजाते और धूल उड़ाते निकल जातीं है ।रेल न सही बस से बैठकर कहीं जाना चाहिए तो कैसे एक अदत बस स्टैंड नहीं है खुले आसमान में जान जोखिम में डालकर हा ईवे सड़क के किनारे खड़े होकर हाथ देना पड़ता है बस ड्राइवर की इच्छा है तो रोककर बैठा लेता है नहीं तो खड़े खड़े धूल फांक जब तक कोई दूसरी बस आकर नहीं रुकती।कुछ सहारा यमुना मईया से था । जिनके किनारे सुन्दर मन्दिर पक्के घाट है जहां वर्ष मे स्नान पर्वों पर नजदीकी जनपदों ग्रामीण क्षेत्रों से हजारों की संख्या मे लोग आते थे पर दुर्भाग्य ही कहें यमुना मईया भी रूठ कल कालपी को छोड़कर दूर चली गईं इसके अलावा बा ई घाट पीला घाट में बने सुन्दर मन्दिर भी ध्वस्त हो गए। समय की मार व्यापार और यहां के पारम्परिक उद्योग धंधों कागज कपड़ा कालीन पर भी पड़ी बढ़ती बिजली की दरों मार्केट मे चीनी कागज आने से हाथ कागज उद्योगों पर गहन पड़ा इसी में कपड़ा बनाने वाली पावर लूम बिक गए और प्रोसेसिंग की सुविधा न मिलने से कालीन उद्योग भी समाप्त हो गया। इसके चलते इन उद्योगों से जुड़े कारीगर श्रमिक भी बेरोजगार हो कर पलायन कर गए।यही हाल मार्केट का है बड़े बड़े व्यापारी अपना बोरिया बिस्तर सीमेंट कर महानगरों बस गए। वो तो भला हो कालपी क्षेत्र के ग्रामीणों का जो कालपी मे ए और धंधा विजनेश में कुछ इनवेस्ट किया। अन्यथा तो यहां पुरानी पुरातात्विक इमारतों हवेलियों चाहे काली हवेली हो रंग महल हो य मन्दिर मस्जिद हो को खोद खोद कर उनमें कब्जाकर अपना अपना आशियाना बनाने मे ही लगे हैं और दूसरों को भी दे देते है कुछ धन लेकर। यहां के कुछ दबंग भू माफिया किस्म के लोग ।इसका फायदा सरकारी अधिकारियों ने भी खूब उठाया जैसे वन विभाग समाज कल्याण विभाग नगल पालिका आदि गुपचुप रूप से सरकारी भूमि को चंद पैसों में कब्जा कराकर चलते बनते हैं ।
ऐसा नहीं है कि कालपी में खजाने की कमी हो बहुत है जिसमे यमुना की रेत वन की लकड़ी ये ऐसे खजाने हैं जो चौबीसों घंटे लूटे जा रहे है बस.फर्क इतना है कि इसे बाहरी लोग लूट रहे हैं यहां के लोग तो लूट के मूकदर्शक हैं। हां चंद लोग पूरी बफादार से लुटेरों का साथ देकर कुछ टुकड़े पा जाते हैं ।











