लेख
संवेदनशून्यता एक विकृत मानसिक रोग है जो व्यक्ति को अपने तटस्थ विचारों से ऊपर नहीं उठने देता ये व्यक्ति में अन्तर्निहित भावों को पूर्णता के शिखर तक नहीं पहुँचने देता एवं नकारात्मक व्यक्तित्व का निर्माण करता है ये ऊर्जा को सकारात्मक कार्यों में प्रवृत्त नहीं होने देता और कुशल चेतना का प्रादुर्भाव अवरुद्ध कर देता है यही मनोविज्ञान व्यक्ति के स्वभाव में चिड़चिड़ापन खिसियाहट एवं छटपटाहट उत्पन्न करता है जो भावनाओं को उस के पतन की ओर ले जाता है और यहीं से आरम्भ होता है स्वयं से स्वयं का द्वंद्व ऐसा व्यक्ति फिर कोई निर्णय नहीं ले पता एवं ये या वो में उलझा रहता है ऐसा व्यक्ति अर्जुन तो बन जाता है पर गीता ग्रहण करने वाला पार्थ नहीं बन पाता क्यूंकि उसकी संपूर्ण ऊर्जा स्वयं को परिपक्व बनाने में ही निकल जाती है और जनहित के कार्य नहीं कर पाता भाव जब संवेदनाओं से हीन हो जाता है तो वह बांस के पेड़ की तरह ठूँढ हो जाता है और उसमे सीखने की प्रवृत्ति भी समाप्त हो जाती है अर्जुन जिस प्रकार अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा को एकत्रित कर चिड़िया की आँख पर निशाना लगा देता है वैसे वो व्यक्ति नहीं कर पाता जो संवेदनशून्य है क्यूंकि उसकी बुद्धि सदैव इसी द्वंद्व में रहती है की जिस पर वो लक्ष्य साध रहा है वह सही है भी या नहीं ऐसी अवस्था से बाहर आने का सिर्फ एक उपाय है और वह है विकट परिस्थिति आने पर स्वयं से प्रश्न करना की जिस विकल्प का चयन किया जा रहा उससे कितने प्रतिशत लोग लाभान्वित होंगे











