कम ही लोग जानते है कालपी के रानी लक्ष्मीबाई चौराहे को
कालपी(जालौन)
भारत की स्वतंत्रा के आन्दोलन में उत्तर भारत के स्वतंत्रा संग्राम के वीरो रणवाकुरों स्वतंत्रा संग्राम सेनानियों का प्रमुख केंद्र रहा है बुन्देलखण्ड का प्रवेश द्वार जनपद जालौन का कस्बा कालपी पर ग्लानि तब होती है कि जब देखते हैं उन वीरों के नाम से उनकी स्म्रति उनकी वीर गाथा की याद के लिए एक चबूतरा तक नहीं है कालपी में हां काफी जद्दोजहद के बाद टरननगंज मुख्य चौराहे को नगर पालिका ने रानी लक्ष्मीबाई चौराहा नाम भर दे दिया है और सौ दो सौ रुपए का एक टीन का बोर्ड बनवाकर चौराहे की एक दुकान मे लगवा दिया जिसे देखकर मन में खुशी कम पीड़ा अधिक होती है कि इतनी बड़ी वीरांगना के नाम से बने चौराहे पर एक बोर्ड मे नाम लिख कर लगा देना उनका सम्मान है य अपमान।
क्या जानेगी आने वाली पीढ़ी कि हमने जिस नगर में जन्म लिया उसका क्या इतिहास है उसकी क्या पहचान है।
उत्तर प्रदेश का एक ऐसा कस्बा जिसे पुराणों में जिसे इतिहास में तो उत्तम स्थान मिला पर धरातल पर गुमनाम है ।इस नगर की पौराणिकता त्रेता द्वापर में सिद्ध होती है इतिहास भी इसकी गवाही देता है पर कालपी को उपेक्षित रखने में आजादी के बाद जितनी भी सरकारें बनी जितने यहां के जनप्रतिनिधि हुए चाहे वह सांसद हों बिधायक हो य नगर पालिकाध्यक्ष हों सभी दोषी हैं। दोषी इन्हें भी कहा जा सकता जो अपने आप को समाजसेवी कहलाना पसंद करते हैं य स्वतंत्रा संग्राम सेनानियों के वंशज बताकर सीना फुलाते हैं।
कालपी कोई साधारण कस्बा नहीं है यह एक महानगर था एक बहुत बड़ा व्यापारिक केन्द्र जहां बड़े बड़े व्यापारी रहते थे यह एक राज्य था बहुत ही धनाढ्य शहल था देश के तमाम राजा महाराज कालपी को जीतकर अपना राज कायम करने की तमन्ना रखते थे ।कालपी पर हजारों आक्रमण हुए राजा महाराजा ओं से लेकर मुगल शासकों ने फिरंगियों ने सभी ने लूटा तोड़ फोड़ की और आज इस नगर की स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि यह अपनी पहचान हीनता जा रहा है।
इसकी अस्मिता इसकी पहचान इसके गौरव की रक्षा के लिए कोई और नहीं कालपी के लोगों को ही आगे आना होगा।











